Gudi Padwa 2019: जानें गुड़ी पड़वा मनाने का कारण और शुभ मुहूर्त

चैत्र नवरात्रि को महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा के तौर पर और आन्ध्र प्रदेश व कर्नाटक में उगादी के नाम से मनाते हैं। महाराष्ट्र और कोंकण में इसे संवत्सर पडवो भी कहते हैं।

क्या है गुड़ी पड़वा
गुड़ी पड़वा या संवत्सर पडवो को मराठी और कोंकणी समुदाय के लोग वर्ष के  पहले दिन के रूप में मनाते हैं। इस दिन से नया संवत्सर, जो साठ वर्षों का  चक्र है, भी शुरू होता है। सभी साठ संवत्सर की पहचान अलग नाम से की जाती  है। गुड़ी पड़वा को कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में उगादि के रूप में मनाया  जाता है। चैत्र नवरात्रि, गुड़ी पड़वा और उगादि सभी एक ही दिन मनाए जाते  हैं। लुडी-सौर कैलेंडर के अनुसार गुड़ी पड़वा मराठी नववर्ष है। लूनी-सौर  कैलेंडर चंद्रमा और सूर्य की स्थिति को महीने और दिनों में विभाजित करने के  लिए जाना जाता है।इसी का अलग पक्ष सौर कैलेंडर है जो वर्ष को महीनों और  दिनों में विभाजित करने के लिए केवल सूर्य की स्थिति को मानता है। इसी कारण  हिंदू नव वर्ष को दो बार अलग-अलग नामों से और वर्ष के दो अलग-अलग समय में  मनाया जाता है। सौर कैलेंडर पर आधारित हिंदू नववर्ष को तमिलनाडु में पुथांडु, असम में बिहू, पंजाब में वैसाखी, उड़ीसा में पान संक्रांति और  पश्चिम बंगाल में नाबा बरसा के नाम से जाना जाता है।

ऐसे मनाते हैं गुड़ी पड़वा
गुड़ी पड़वा के दिन की शुरुआत अनुष्ठान के बाद तेल-स्नान से होती है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन तेल से स्नान और नीम के पत्तों को खाना एक पवित्र अनुष्ठान माना गया है। जब उत्तर भारत में नौ दिन की चैत्र नवरात्रि पूजा शुरू होती है तभी गुड़ी पड़वा का शुभारंभ होता है। साथ ही नवरात्रि के पहले दिन मिश्री के साथ नीम खाने की परंपरा रही है।

गुड़ी पड़वा का चौघड़िया मुहूर्त

दिन का चौघड़िया: 06:19-07:51, काल, काल वेला, 07:51-09:24 शुभ, 09:24-10:57 रोग, 10:57-12:30 उद्वेग, 12:30-14:02 चर, 14:02-15:35 लाभ वार वेला, 15:35-17:08 अमृत, 17:08-18:40 काल काल वेला।

रात्रि का चौघड़िया: 18:40-20:08 लाभ काल रात्रि, 20:08-21:35 उद्वेग, 21:35-23:02 शुभ, 23:02-24:29 अमृत, 24:29-25:56 चर, 25:56-27:23 रोग, 27:23-28:51 काल, 28:51-30:18 लाभ काल रात्रि।

चौघड़िया का उपयोग इसकी सरलता के कारण मुहूर्त देखने के लिए किया जाता है। किसी शुभ कार्य को प्रारम्भ करने के लिए अमृत, शुभ, लाभ और चर, इन चार चौघड़ियाओं को उत्तम माना गया है और शेष तीन चौघड़ियाओं, रोग, काल और उद्वेग, को सही नहीं मानते हैं उन्हें त्याग देना चाहिये। सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य के समय को दिन का चौघड़िया कहा जाता है तथा सूर्यास्त और अगले दिन सूर्योदय के मध्य के समय को रात्रि का चौघड़िया कहा जाता है। माना जाता है कि वार वेला, काल वेला और काल रात्रि के दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं किये जाने चाहिये। वार वेला एवं काल वेला दिन के समय जबकि काल रात्रि, रात के समय होती है।

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